भगवद्गीता क्या है?


भगवद्गीता क्या है:

भगवद्गीता महाभारत का अंश है परंतु उसकी अपनी अलग जगह है और मैं अपने आप में मुकम्मल है। यह 700 श्लोकों का एक छोटा सा काव्य है। इसकी रचना बौद्ध काल से पहले हुई थी।तब से अब तक इसकी लोकप्रियता और प्रभाव कम नहीं हुआ। विचार और दर्शन का हर संप्रदाय इसे श्रद्धा से देखता है और अपने ढंग से इसकी व्याख्या करता है। संकट के समय, जब मनुष्य के मन को संदेह सताता है और वह कर्तव्य के बारे में दुविधा ग्रस्त होता है तो वह प्रकाश और मार्गदर्शन के लिए गीता की ओर देखता है क्योंकि यह संकट- काल के लिए लिखी गई कविता है- राजनीतिक और सामाजिक संकट के लिए और उससे भी अधिक मनुष्य की आत्मा के संकट के लिए। गीता की असंख्य व्याख्याएं की गई और अब भी लगातार की जा रही है। आधुनिक युग के विचार और कर्म क्षेत्र के नेताओं तिलक, अरविंद घोष, गांधी सभी ने इसकी अपने ढंग से व्याख्या की है। गांधीजी ने इसे अहिंसा में अपने दृढ़ विश्वास का आधार बनाया है, और उन्हें धर्म कार्य के लिए हिंसा और युद्ध का औचित्य इसी के आधार पर सिद्ध किया है।
इस काव्य का आरंभ महाभारत का युद्ध आरंभ होने से पहले युद्ध क्षेत्र में अर्जुन और कृष्ण के बीच संवाद से होता है। अर्जुन परेशान है। उसकी अंतरात्मा युद्ध और उसमें होने वाले व्यापक नरसंहार के , मित्रो और संबंधियों के संघार के विचार के विरुद्ध विद्रोह कर उठती हैं। आखिर यह किसलिए? कौन सा ऐसा लाभ हो सकता है जो इस हानि, इस पाप का परिहार कर सके। उसकी पुरानी कसौटी नाकाम हो जाती है उसके मूल्य डर जाते हैं। अर्जुन इंसान की स्पीड का आत्मा का प्रतीक बन जाता है जो युग- युग से कर्तव्य और नैतिकता के तकाजों की दुविधा से ग्रस्त है। इस निजी बातचीत से हम एक-एक करके व्यक्ति के कर्तव्य, सामाजिक आचरण, मानव जीवन में सदाचार और सब को नियंत्रित करने वाले आध्यात्मिक दृष्टिकोण जैसे विषयों की ओर बढ़ते हैं। गीता में ऐसा बहुत कुछ है जो आध्यात्मिक है। इसमें मानव विकास के तीन मार्गो ज्ञान,कर्म और भक्ति के बीच समन्वय करने का प्रयास किया गया है। बाकी दो  की तुलना में भक्ति पर अधिक बल दिया गया है। यहां तक कि इसमें एक व्यक्तिगत ईश्वर का स्वरूप उभरता है, हालांकि उसे पूर्ण रूप परमेश्वर का ही अवतार माना गया है। गीता में मानव-अस्तित्व की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का निरूपण किया गया है। रोजमर्रा की जिंदगी की व्यावहारिक समस्याएं इसी संदर्भ में सामने आती है। गीता में जीवन के कर्तव्यों के निर्वहन के लिए कर्म का आह्वान किया गया है, अकर्मण्यता की निंदा की गई है और कहा गया है कि कर्म और जीवन को समय के उत्सव आदेशों के अनुरूप होना चाहिए क्योंकि यह आदर्श समय-समय पर स्वयं ही बदल सकते हैं। युग धर्म अर्थात विशेष युग क अपने आदर्श को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।
गीता का संदेश ने सांप्रदायिकता है और ना ही किसी विशेष विचारधारा के लोगों को संबोधित करता है। इसकी दृष्टि सार्वभौमिक है। उसमें कहा गया है-"सभी रास्ते मुझ तक आते हैं।" इसी सार्वभौमिकता के कारण गीता सभी वर्गों और संप्रदायों के लोगों के लिए मानने हुई। इसकी रचना के बाद ढाई हजार वर्षों में भारत वासी बार-बार परिवर्तन, विकास और पतन की प्रक्रिया से गुजरे हैं, उन्हें एक के बाद एक, तरह-तरह के अनुभव हुए हैं। एक के बाद एक विचार सामने आए हैं पर उन्हें हमेशा गीता में कोई ऐसी जीवंत चीज मिली है जो विकसित होते विचारों से मेल खाती रही।


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